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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लाखों आदिवासी हो सकते हैं बेघर

Yamini Saini

एक वाइल्डलाइफ एनजीओ ने जनजातियों व अन्य परंपरागत वनवासियों के लिए बने कानून एफआरए को चुनौती देते हुए इसे रद्द करने की मांग की.

 

सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश जिसमें कोर्ट ने देश के 16 राज्यों में जंगलों में गैर-कानूनी तरीके से रहने वाले लोगों को बाहर निकालने को कहा उसकी वजह से करीब 10 लाख आदिवासी परिवार प्रभावित होंगें. इस आदेश के चलते विपक्ष के हाथों में केंद्र सरकार पर हमले करने के लिए एक और हथियार आ गया है. विपक्ष का कहना है कि केंद्र सरकार जानबूझकर आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की कोशिश नहीं कर रही है.

दरअसल, एक वाइल्डलाइफ एनजीओ ने जनजातियों व अन्य परंपरागत वनवासियों के लिए बने कानून एफआरए को चुनौती देते हुए इसे रद्द करने की मांग की. उनका कहना है कि ये संविधान के अनुरूप नहीं है. कोर्ट के आदेश के बाद 10 लाख से ज्यादा परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है. यह संख्या अभी और भी सकती है. बता दें कि एफआरए गोंड, मुंडा या डोंगरिया कोंध जैसी जनजातियों को जंगल में रहने, उसे सुरक्षित रखने, जुताई करने का अधिकार देता है.

वन विभाग वनवासियों को वहां से बाहर निकालने में हमेशा से काफी तेज़ी दिखाता रहा है. पिछले साल जनजाति मामलों के मंत्रालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखा कि ऐसा देखा गया है कि वन विभाग जिन भी लोगों के क्लेम को एफआरए के अंदर रिजेक्ट किया उन लोगों को तुरंत हटा दिया गया. इस बात का इंतजार नहीं किया गया कि वे दुबारा पुनर्विचार याचिका दायर कर सकें या अपील कर सकें. मंत्रालय ने कहा कि यह इसलिए किया गया क्योंकि जंगलों से जो छोटे उत्पाद मिलते हैं उनसे राज्य को अच्छी खासी आय होती है, यहां तक कि लकड़ियों को बेचने से भी ज्यादा.

हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सिर्फ उन्हीं लोगों को जंगलों से बाहर निकाला जाएगा जो कि फर्जी तरीके से वहां रह रहे हैं. लेकिन आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वालों का कहना है किसी के क्लेम को रिजेक्ट किए जाने का ये अर्थ नहीं है क्योंकि काफी लोगों का क्लेम वन अधिकारियों के गलत तरीके से हस्तक्षेप करने की वजह से रिजेक्ट हुआ है.

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा आदेश दिया है. इससे पहले 2016 में कोर्ट ने राज्य सरकारों से शपथपत्र मांगा था कि किन लोगों के क्लेम रिजेक्ट किए गए हैं? साथ ही ये भी कहा था कि जिन लोगों के क्लेम को रिजेक्ट किया गया उन लोगों को अभी तक वहां से बाहर क्यों नहीं निकाला गया. इस पर जनजाति मामलों के मंत्रालय ने कहा था कि उसमें काफी लोगों के क्लेम को गलत तरीके से रिजेक्ट किया गया है उन्हें दुबारा मौका देना ज़रूरी है. विपक्षी पार्टियां अब लगातार यही आरोप लगा रही हैं कि इस बार सरकार की तरफ से कोई वकील मौजूद नहीं था इसका अर्थ है कि सरकार आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा नहीं करना चाहती.

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