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USA में सीनेटर बनीं बिहार की मोना, समाजसेवा के बल पर राजनीति में बनाया मुकाम

Yamini Saini

मोना दास के सीनेटर बनने से इलाके में खुशी की लहर है. गांव में रह रहे परिजनों की माने तो मोना ने पूरी दुनिया में अपने गांव दरियापुर का नाम रोशन कर दिया है.

बिहार के मुंगेर की मूल निवासी मोना दास अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी से सीनेट की सदस्य निर्वाचित हुईं हैं. उन्हें यह सफलता पहली बार में ही मिली है. उन्होंने गोरे को पराजित किया है जो लगातार आठ वर्षों से जीत रहा था. राजनीति में यह मुकाम उन्‍होंने जनसेवा व हौसले के बल पर पाया है. 14 जनवरी को मोना ओलंपिया में शपथ लेंगी. मोना अब अमेरिकी नागरिक हैं, हालांकि मुंगेर जिले के नक्सल प्रभावित हवेली खडग़पुर अनुमंडल के दरियापुर गांव को अपनी इस बेटी पर गर्व है. अमेरिका में रहने वाले उनके इंजीनियर पिता सुबोध दास का गांव से जुड़ाव अब भी कायम है. मोना दास मुंगेर के पूर्व सिविल सर्जन डॉ. गिरिश्वर नारायण दास की पौत्री है.

मोना दास के सीनेटर बनने से इलाके में खुशी की लहर है. गांव में रह रहे परिजनों की माने तो मोना ने पूरी दुनिया में अपने गांव दरियापुर का नाम रोशन कर दिया है. गांव में मोना दास के परिवारजनों ने कहा अब बिटिया एक बार गांव आए जाए, यही तमन्ना है. मोना की दादी चमेली देवी ने बताया कि दो वर्ष पूर्व सुबोध दास एक शादी समारोह में शामिल होने दरियापुर गांव आए थे. वे अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. पति डॉ. जीएन दास भी वहीं रह रहे हैं. फोन पर सुबोध, अन्य पुत्रों व मोना से बातचीत होती रहती है. मोना के पिता सुबोध दास ने ही बेटी के सीनेट सदस्य चुने जाने की सूचना दी थी.

मोना का जन्म 1971 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ही हुआ था, यह बातें अमेरिका में रह रहे चाचा अजय दास ने बताई. मोना के पिता सुबोध दास व सगे चाचा अजय दास अमेरिका में इंजीनियर हैं. एक और चाचा विजय दास वहीं डॉक्टर हैं. बाद में वे मोना व उसकी मां को साथ लेकर अमेरिका चले गए. मोना के भाई सोमदास का जन्म अमेरिका में हुआ था. मोना लगभग 12-14 वर्ष की उम्र में दरियापुर गांव आईं थीं. उसके बाद से वे यहां नहीं आ पाईं हैं. मोना और उनके छोटे भाई सोम की शादी अमेरिका में हुई है.

बड़ी होने पर मोना ने अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातक की डिग्री ली. आगे उसने पिंचोट विवि से प्रबंधन में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की. लेकिन जन सरोकार व जनसेवा में अत्यधिक रूचि रहने के कारण वे प्रबंधन से अधिक राजनीति में आगे बढ़ती चली गईं. राजनीति की राह आसान तो नहीं रही, लेकिन जनसेवा के बल पर जनसमर्थन बढ़ता गया. साथ ही बढ़ता गया हौसला. परिणाम भी समाने है. वे अब सीनेटर बन गईं हैं.

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