Latest News

एक आस्था,एक विश्वास जहा विज्ञान भी हे फेल

PC Pareek
  • विज्ञान के इस युग में भी लोगों की आस्था और विश्वास का केंद्र है नागौर जिले का बुटाटी गांव, जहां लकवे के रोगी ठीक होते हैं.
  • सिद्ध पुरुष चतुरदास महाराज की कृपा से हर वर्ष लकवे के हजारों मरीज सात दिनों की परिक्रमा के बाद ठीक हो जाते हैं.
इस अत्याधुनिक युग में विज्ञान भी बहुत सी बातों का पता लगा पाने में जहां असफल हो जाता है वहां से शुरू होता है श्रद्धा और अंधविश्वास। बच्चों को नजर लग जाती है तो नजर उतारने की प्रक्रिया को मजाक में लोग उड़ा देते है मगर वही जब अपना कोई परिचित भरपूर इलाज़ के बाद भी ठीक ना हो रहा हो या बिना किसी कारण सुस्त, उखड़ा या उदास हो तो हम झट नजर उतारने के हथियार इस्तेमाल करते हैं। लकवे के रोगियों को भी चिकित्सकों के इलाज के बाद राहत न मिलने पर श्रद्धा नागौर के बूटाटी ग्राम में खींच लाती है। कहा जाता है कि यहां पर हर साल हजारों लोग पैरालायसिस (लकवे) के रोग से मुक्त होकर जाते हैं। यह धाम नागौर जिले के कुचेरा क़स्बे के पास है। अजमेर- नागौर रोड़ पर यह गांव स्थित है। लगभग पांच सौ साल पहले एक संत हुये थे चतुरदास जी वो सिद्ध योगी थे। बताते हैं कि वो अपनी तपस्या से प्राप्त विद्या से लोगों को रोग मुक्त करते थे। लोगों का कहना है कि आज भी उनकी समाधी पर सात फेरी लगाने से लकवा जड़ से ख़त्म हो जाता है। नागौर जिले के अलावा पूरे देश से लोग यहां आते है और रोग मुक्त होकर जाते हैं। यहां हर साल वैसाख, भादवा और माघ महीने मे पूरे महीने मेला लगता है। इस मंदिर में सिद्ध पुरुष चतुरदास जी महाराज की समाधि है। लकवे के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगानी होती है। सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है। ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है, सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है। जो लकवे के मरीज स्वयं चलने फिरने में असमर्थ होते हैं उन्हें परिजन परिक्रमा लगवाते हैं। निवास के लिए यहां सुविधा युक्त धर्मशालाएं हैं यात्रियों को जरुरत का सभी सामान बिस्तर, राशन, बर्तन, ईंधन आदि निःशुल्क उपलब्ध करवाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त पास में ही बाजार भी है जहां यात्री अपनी सुविधा से अन्य वस्तुएं खरीद सकते हैं। वर्षों पूर्व हुई बीमारी का भी काफी हद तक इलाज होता है यहां कोई पण्डित, महाराज या हकीम नहीं होता ना ही कोई दवाई लगाकर इलाज किया जाता है। यहां तो केवल मरीज को परिजन नियमित लगातार 7 दिन मन्दिर की परिक्रमा लगवाते हैं। हवन कुण्ड की भभूति लगाते हैं और बीमारी धीरे-धीरे अपना प्रभाव कम कर देती है शरीर के अंग जो हिलते डुलते नहीं हैं वह धीरे-धीरे काम करने लगते हैं। लकवे से पीड़ित जिस व्यक्ति की आवाज बन्द हो जाती वह भी धीरे-धीरे बोलने लगता है यहां अनेक मरीज जो डॉक्टरो से इलाज करवाने के बाद निराश हो गए थे लेकिन उन मरीजों को यहां काफी हद तक बीमारी में राहत मिली है। दान में आने वाला रुपया मन्दिर के विकास में लगाया जाता है पूजा करने वाले पुजारी को ट्रस्ट द्वारा तनखाह मिलती है मंदिर के आस-पास फेले परिसर में सैकड़ों मरीज दिखाई देते हैं जिनके चेहरे पर आस्था की करुणा झलकती है। संत चतुरदास जी महारज की कृपा का मुक्त कण्ठ प्रशंसा करते दिखाई देते है। उल्लेखनीय है कि बुटाटी ग्राम की स्थापना 1600 ई की शुरूआत में की गई। पौराणिक कथा बुजुर्गो के अनुसार भूरा लाल शर्मा (दायमा) नामक बाह्मण ने बुटाटी की स्थापना की थी। इसके बाद बुटाटी पर राजपूतों का अधिकार हो गया। ग्राम में पश्चिम दिशा की ओर संत श्री चतुरदास जी महाराज का मंदिर है यह मंदिर आस्था का प्रमुख केन्द्र है इस मंदिर में लकवा पीड़ित व्यक्ति मात्र सात परिक्रमा में एकदम स्वस्थ हो जाता है। बाहर से आने वाले यात्रीयों के लिए बिस्तर,भोजन पीने के लिए ठण्डा पानी, खाना बनाने के लिए सामान व बर्तन, जलाने के लिए लकङी सात दिन रूकने के लिए कमरे आदि व्यवस्थाएं निःशुल्क होती है। इन व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने का सम्पूर्ण कार्य मंदिर कमेटी करती है। मंदिर कमेटी के लगभग 50 व्यक्ति समय-समय पर व्यवस्थाओें का जायजा लेते हैं। सर्दी, गर्मी, बरसात किसी भी मौसम में यहां आने वाले यात्रीयों को असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता। नहाने धोने के लिए मंदिर परिसर में उचित व्यवस्था है। प्रत्येक वर्ष मंदिर में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में बारस को एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
 
 
 
 
 

Related News you may like

Article

Side Ad